अनुपम मिश्र नही रहे । दो दिन पहले । जानता हूँ कि देर से लिख रहा हूँ । जानता हूँ कि अब भी उनपर बहुत कुछ लिखा जा रहा होगा । लिखा जा चुका होगा । उनकी शानदार किताबों के पुनर्पाठ, समीक्षा और न जाने क्या क्या फिर किन्ही पत्रिकाओं में छप रहे होंगे । बड़े बड़े साहित्यकार और चिंतक उनपर लिख रहे होंगे, संस्मरणों के झरोखों से झाँककर उनके साथ जिए हुए पलों को याद कर रहे होंगे । और ये सब किया भी जाना चाहिए । बिलकुल किया जाना चाहिए ।
मेरे पास अनुपम जी का कोई संस्मरण नहीं है । मैं उनसे कभी नहीं मिला । मेरे अनुभव किसी परिचित के अनुभव नहीं है । किसी रिश्तेदार के संस्मरण नहीं है । मेरे अनुभव, एक पाठक के अनुभव हैं । और पाठक के तौर पर आप आत्मीयता का ढोंग नहीं कर सकते । पाठक की आत्मीयता बिलकुल सच्ची होती है ।
अनुपम जी और "आज भी खरे है तालाब" जैसे एक दूसरे के पर्याय हो गए थे । लेखक का नाम आते ही, यही किताब ज़ेहन में आती थी, और किताब का ज़िक्र होते ही अनुपम जी की छवि उभर आती थी । मुझे नहीं लगता कि ऐसा बहुत लोगों के साथ होता होगा ।
उनकी किताबों में कभी उनका नाम नहीं देखा । मुखपृष्ठ पर किताब के नाम के नीचे गांधी शांति प्रतिष्ठान लिखा होता है । (मै नहीं जानता अगर कहीँ और से भी उनकी पुस्तकें छपी । ) मूल्य तो खैर लिखा ही नहीं होता था । इन सब के बावजूद अनुपम जी ने अपने पाठकों से एक ऐसा आत्मीय रिश्ता जोड़ा था, जो अपने में के एक मिसाल है ।
वे नदियों के अपने थे । तालाबों से उन्हें प्रेम था, और वे प्रत्येक कुँए बावड़ी में अपना अक्स देखते थे । शायद इसलिए वो इतना आत्मीय होकर लिख सकते थे, इसलिए इतनी गहराई से सोच सकते थे । नदियों के लिए, वे बनी, उत्पन्न हुई जैसे प्रयोग न करके, रचीं, जन्मी इस तरह के शब्दों का प्रयोग करते थे । उनके लिए नदियों का जन्म मनुष्य जन्म के समान था । नदियों से इस तरह की आत्मीयता थी उनकी ।
शायद उन्होंने धरती की उस पीड़ा का अनुभव किया होगा, जिसमे धरती की असह्य प्रसव वेदना के बाद, नदी ने फूटकर अपने दर्शन दिए होंगे । नदी के जन्मने की खुशी में उनकी आँखे भी छलक पडी होंगी । ऐसा सिर्फ उनके साथ हो सकता था । क्योंकि वे अनुपम थे । सच्चे अर्थों में अनुपम !
विनम्र श्रद्धांजलि !!!

