Wednesday, 21 December 2016

एक थे अनुपम...

                                 


अनुपम मिश्र नही रहे । दो दिन पहले । जानता हूँ कि देर से लिख रहा हूँ । जानता हूँ कि अब भी उनपर बहुत कुछ लिखा जा रहा होगा । लिखा जा चुका होगा । उनकी शानदार किताबों के पुनर्पाठ, समीक्षा और न जाने क्या क्या फिर किन्ही पत्रिकाओं में छप रहे होंगे । बड़े बड़े साहित्यकार और चिंतक उनपर लिख रहे होंगे, संस्मरणों के झरोखों से झाँककर उनके साथ जिए हुए पलों को याद कर रहे होंगे । और ये सब किया भी जाना चाहिए । बिलकुल किया जाना चाहिए ।

मेरे पास अनुपम जी का कोई संस्मरण नहीं है । मैं उनसे कभी नहीं मिला । मेरे अनुभव किसी परिचित के अनुभव नहीं है । किसी रिश्तेदार के संस्मरण नहीं है । मेरे अनुभव, एक पाठक के अनुभव हैं । और पाठक के तौर पर आप आत्मीयता का ढोंग नहीं कर सकते । पाठक की आत्मीयता बिलकुल सच्ची होती है ।

अनुपम जी और "आज भी खरे है तालाब" जैसे एक दूसरे के पर्याय हो गए थे । लेखक का नाम आते ही, यही किताब ज़ेहन में आती थी, और किताब का ज़िक्र होते ही अनुपम जी की छवि उभर आती थी । मुझे नहीं लगता कि ऐसा बहुत लोगों के साथ होता होगा ।

 उनकी किताबों में कभी उनका नाम नहीं देखा ।  मुखपृष्ठ पर किताब के नाम के नीचे गांधी शांति प्रतिष्ठान लिखा होता है ।  (मै नहीं जानता अगर कहीँ और से भी उनकी पुस्तकें छपी । ) मूल्य तो खैर लिखा ही नहीं होता था । इन सब के बावजूद अनुपम जी ने अपने पाठकों से एक ऐसा आत्मीय रिश्ता जोड़ा था, जो अपने में के एक मिसाल है ।

वे नदियों के अपने थे । तालाबों से उन्हें प्रेम था, और वे प्रत्येक कुँए बावड़ी में अपना अक्स देखते थे । शायद इसलिए वो इतना आत्मीय होकर लिख सकते थे, इसलिए इतनी गहराई से सोच सकते थे । नदियों के लिए, वे बनी, उत्पन्न हुई जैसे प्रयोग न करके, रचीं, जन्मी इस तरह के शब्दों का प्रयोग करते थे । उनके लिए नदियों का जन्म मनुष्य जन्म के समान था ।  नदियों से इस तरह की आत्मीयता थी उनकी ।

शायद उन्होंने धरती की उस पीड़ा का अनुभव किया होगा, जिसमे धरती की असह्य प्रसव वेदना के बाद, नदी ने फूटकर अपने दर्शन दिए होंगे । नदी के जन्मने की खुशी में उनकी आँखे भी छलक पडी होंगी । ऐसा सिर्फ उनके साथ हो सकता था । क्योंकि वे अनुपम थे । सच्चे अर्थों में अनुपम !

विनम्र श्रद्धांजलि !!!


Friday, 1 July 2016

बाबा को याद करते हुए



कल बाबा नागार्जुन की जयंती थी । अपनी उम्र के शुरुआती सालों में जब मैं कविता करना सीख रहा था,  हमारे घर के सबसे कोने वाले कमरे में पापा की बरसो पहले खरीदी किताबों में, मुझे पहली कविता की किताब मिली थी - बाबा नागार्जुन की प्रतिनिधि कविताएँ । मेरी उम्र उस समय कोई दस-बारह साल रही होगी । उस साल गर्मी की छुट्टियों में खोजी हुई कविता की शायद वो इकलौती किताब थी, सो वैसे भी उस किताब के अलावा कोई चारा नहीं था । उस साल तक बाबा मेरे लिए उन कई ज्ञात-अज्ञात कवियों में से थे जिन्हें कम से काम मेरी उम्र के लोग कोर्स की किताबों से ज़्यादा नहीं जानते थे । उस किताब की पहली कविता - प्रतिबद्ध हूँ, शतधा प्रतिबद्ध हूँ , तब समझ नहीं आई । हाँ, बाबा की प्रसिद्ध कविता - फूले कदंब, झूले कदंब, अच्छी लगी थी । चार पूत भारत माता के, वह दंतुरित मुस्कान जैसी कविताओं से गुज़रते हुए, जब तक मैं "बादल को घिरते देखा है " तक पहुँचा, हिन्दी का यह फक्कड़, मस्तमौला और अल्हड कवि मुझे पूरी तरह काबू कर चुका था ।

                                                                                ***   

बाबा के बारे में एक किस्सा कभी स्व. दादा विकल जी (डॉ. हकुमपाल सिंह विकल) ने सुनाया था । शायद सन 84-85 की बात । भोपाल में मैदा मिल में उस समय जो अखिल भारतीय कवि सम्मलेन हुआ करते थे, उस साल वहाँ नागार्जुन आये थे । हज़ारों लोगों की भीड़ थी, और कविता पाठ की शुरुआत के लिए कोई नौजवान कवि आया था । उस कवि की कविताई का जादू ऐसा कि सारे लोग हैरान । तालियों की गड़गड़ाहट के बीच वो कवि अब भी अपनी कविता सुना रहा था । जब पढ़ना बंद हुआ, तो अचानक ही नागार्जुन उस नौजवान के पास पहुंचे, और पूछा - ये सरोज जी (मुकुट बिहारी सरोज) की कविता है न ? उस कवि ने सर झुका लिया, और नागार्जुन ने ऐसा ज़ोरदार थप्पड़ लगाया कि खलबली मच गई । इस घटना के बाद उस कवि सम्मेलन का क्या हुआ, नहीं पता । लेकिन दादा विकल जी की तरह ही मेरे मन पर भी, हिन्दी के इस दिलेर और स्वाभिमानी कवि की छाप हमेशा के लिए पड गयी । सादर नमन । 

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