Friday, 1 July 2016

बाबा को याद करते हुए



कल बाबा नागार्जुन की जयंती थी । अपनी उम्र के शुरुआती सालों में जब मैं कविता करना सीख रहा था,  हमारे घर के सबसे कोने वाले कमरे में पापा की बरसो पहले खरीदी किताबों में, मुझे पहली कविता की किताब मिली थी - बाबा नागार्जुन की प्रतिनिधि कविताएँ । मेरी उम्र उस समय कोई दस-बारह साल रही होगी । उस साल गर्मी की छुट्टियों में खोजी हुई कविता की शायद वो इकलौती किताब थी, सो वैसे भी उस किताब के अलावा कोई चारा नहीं था । उस साल तक बाबा मेरे लिए उन कई ज्ञात-अज्ञात कवियों में से थे जिन्हें कम से काम मेरी उम्र के लोग कोर्स की किताबों से ज़्यादा नहीं जानते थे । उस किताब की पहली कविता - प्रतिबद्ध हूँ, शतधा प्रतिबद्ध हूँ , तब समझ नहीं आई । हाँ, बाबा की प्रसिद्ध कविता - फूले कदंब, झूले कदंब, अच्छी लगी थी । चार पूत भारत माता के, वह दंतुरित मुस्कान जैसी कविताओं से गुज़रते हुए, जब तक मैं "बादल को घिरते देखा है " तक पहुँचा, हिन्दी का यह फक्कड़, मस्तमौला और अल्हड कवि मुझे पूरी तरह काबू कर चुका था ।

                                                                                ***   

बाबा के बारे में एक किस्सा कभी स्व. दादा विकल जी (डॉ. हकुमपाल सिंह विकल) ने सुनाया था । शायद सन 84-85 की बात । भोपाल में मैदा मिल में उस समय जो अखिल भारतीय कवि सम्मलेन हुआ करते थे, उस साल वहाँ नागार्जुन आये थे । हज़ारों लोगों की भीड़ थी, और कविता पाठ की शुरुआत के लिए कोई नौजवान कवि आया था । उस कवि की कविताई का जादू ऐसा कि सारे लोग हैरान । तालियों की गड़गड़ाहट के बीच वो कवि अब भी अपनी कविता सुना रहा था । जब पढ़ना बंद हुआ, तो अचानक ही नागार्जुन उस नौजवान के पास पहुंचे, और पूछा - ये सरोज जी (मुकुट बिहारी सरोज) की कविता है न ? उस कवि ने सर झुका लिया, और नागार्जुन ने ऐसा ज़ोरदार थप्पड़ लगाया कि खलबली मच गई । इस घटना के बाद उस कवि सम्मेलन का क्या हुआ, नहीं पता । लेकिन दादा विकल जी की तरह ही मेरे मन पर भी, हिन्दी के इस दिलेर और स्वाभिमानी कवि की छाप हमेशा के लिए पड गयी । सादर नमन । 

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